शासकीय आबादी मद भूमि पर भूमाफियाओं की नजर* *आखिर कौन है मास्टरमाइंड जो कर रहा कागजों में काला पीला*

*शासकीय आबादी मद भूमि पर भूमाफियाओं की नजर*

 

*आखिर कौन है मास्टरमाइंड जो कर रहा कागजों में काला पीला*

 

*रक्षक सोता रहा, भरोसा बिकता रहा’: घोड़ाडोंगरी में आबादी भूमि पर कब्जे का खेल, परिषद की भूमिका पर सवाल*

घोड़ाडोंगरी।

नगर परिषद की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। शासकीय आबादी भूमि की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में परिषद पूरी तरह विफल नजर आ रही है। मामला नगर के खसरा नंबर 667/1 की भूमि से जुड़ा है, जहां वर्षों से खाली पड़ी शासकीय जमीन पर अब कथित रूप से फर्जी तरीके से नाम दर्ज कर संपत्ति आईडी तक बना दी गई।

बताया जा रहा है कि वर्ष 1968-69 से यह भूमि रिक्त है, लेकिन नगर परिषद के संपत्ति कर रजिस्टर में भूमाफियाओं के नाम दर्ज कर दिए गए।

*जांच में टालमटोल, जानकारी छिपाने के आरोप*

जब इस पूरे मामले की पड़ताल की गई तो परिषद के जिम्मेदार अधिकारियों पर जानकारी छिपाने और गुमराह करने के आरोप लगे। आरोप है कि मांगी गई जानकारी को व्यक्तिगत बताकर देने से बचने की कोशिश की गई, जिससे संदेह और गहरा गया।

*नजरी नक्शा और NOC बना ‘खेल’ का आधार*

मामले में यह भी सामने आया कि परिषद द्वारा जारी NOC और पटवारी के नजरी नक्शे के आधार पर शासकीय भूमि पर बने भवनों और दुकानों रिक्त भूमि की रजिस्ट्री कर दी गई, जबकि नियमानुसार कलेक्टर की अनुमति आवश्यक होती है।

*सबसे बड़ा सवाल: जब रकबा नहीं घटा, तो निर्माण कैसे दर्ज हुए?*

राजस्व अभिलेखों के अनुसार खसरा नंबर 667/1 का रकबा आज भी उतना ही है जितना पहले था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब जमीन का रकबा कम नहीं हुआ, तो परिषद रिकॉर्ड में नए भवन और नामांतरण कैसे दर्ज कर दिए गए?

*मुख्य मार्ग पर स्थित है आबादी भूमि*

यह भूमि नगर के मुख्य मार्ग पर स्थित है, जहां आवागमन अधिक रहता है और इसकी बाजार कीमत भी काफी ज्यादा है। इसके बावजूद परिषद की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

*जनता का आक्रोश:* जिम्मेदारों पर FIR की मांग

स्थानीय लोगों में इस पूरे मामले को लेकर भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि जिन अधिकारियों की लापरवाही से यह सब हुआ, उनके खिलाफ FIR दर्ज कर कार्रवाई की जानी चाहिए।

*जनता बोली—अब भरोसा किस पर करें?*

नगरवासियों का कहना है कि जब परिषद में शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं होती, तो सिस्टम से भरोसा उठने लगता है।

*“हमें आश्वासन नहीं, अब न्याय चाहिए”* — यह आवाज अब आम लोगों के बीच से उठने लगी है।

*अब नजर जांच और कार्यवाही पर*

अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में सिर्फ जांच का आश्वासन देता है या वास्तव में दोषियों पर सख्त कार्रवाई करता है।

 

इनका कहना

आबादी भूमि का क्रय विक्रय बगैर जिला कलेक्टर महोदय की अनुमति के नहीं किया जा सकता

दिनेश कोसले

जिला पंजीयक बैतूल

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